Monday, 19 August 2019, 4:00 PM

जीवन मंत्र

वाणी का शरीर पर प्रभाव  

Updated on 19 August, 2019, 6:00
मानव शरीर में अनेक ग्रंथियां होती हैं,पियूष ग्रंथि मस्तिष्क में होती है, उससे 12 प्रकार के रस निकलते है, जो भावनाओं से विशेष प्रभावित होती हैं। जब व्यक्ति प्रसन्नचित होता है, तो इन ग्रनथियों से विशेष प्रकार के रस बहने लगते है, जिससे शरीर पुष्ट होने लगता है, बुद्धि विकसित... आगे पढ़े

 मौन का तन मन की सुन्दरता के लिये महत्व 

Updated on 18 August, 2019, 6:00
प्रत्येक मनुष्य सुन्दर एवं स्वस्थ्य रहना चाहता है। सुन्दरता एवं स्वस्थ्य का राज मौन मै छिपा हुआ है। सामान्यतŠ चुप रहना मौन है, प्राचीन पुराण बचन के साथ ईष्या, डाह, छल, कपट और हिन्सा को कम करना मोन होता है। मनोवैज्ञानिक ‘फ्रायड’ का कहना है कि जीवन अन्तर्द्वद्वी शृंखलाओं से... आगे पढ़े

ध्वनि का प्राणी शरीर पर प्रभाव  

Updated on 17 August, 2019, 6:00
यह जानकर खुश होगें की ध्वनि का प्रभाव प्रत्येक जीव के शरीर पर पड़ता है। वर्तमान औधोगिकी करण और तकनीकि से ध्वनि प्रदूषण अधिक मात्रा में बढ़ रहा है। इस ध्वनि प्रदूषण के परिणाम देखते हुये नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. राबर्ट कॉक ने सन् 1925-26 में एक बात कही थी... आगे पढ़े

जो नहीं है उसे पाना हो ध्येय

Updated on 14 August, 2019, 6:00
असंतुष्ट होने का अर्थ दुखी होना नहीं है। असल में कोई आदमी पूरी तरह सुखी होकर भी असंतुष्ट हो सकता है। सुखी होने का मतलब है, जो है, उसे आनंद से भोगना। और असंतुष्ट होने का अर्थ है: जो नहीं है उसे आनंद से पैदा करने का श्रम करना। जब... आगे पढ़े

जीवन के चार आधार

Updated on 13 August, 2019, 6:00
सुसंस्कारिता के चार आधार हैं- समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी। इन्हें आध्यात्मिक-आंतरिक वरिष्ठता की दृष्टि में उतना ही महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए जितना शरीर के लिए अन्न, जल, वस्त्र और निवास अनिवार्य समझा जाता है। समझदारी का अर्थ है- दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाना। आमतौर से लोग तात्कालिक लाभ को सब कुछ... आगे पढ़े

उपयोगी हल 

Updated on 12 August, 2019, 6:00
एक बार की बात है एक राजा था। उसका एक बड़ा-सा राज्य था।एक दिन उसे देश घूमने का विचार आया और उसने देश भ्रमण की योजना बनाई और घूमने निकल पड़ा। जब वह यात्रा से लौट कर अपने महल आया। उसने अपने मंत्रियों से पैरों में दर्द होने की शिकायत... आगे पढ़े

सम्यक दृष्टिकोण की जरूरत

Updated on 11 August, 2019, 6:00
आज मानवता को बचाने से अधिक कोई करणीय काम प्रतीत नहीं होता। मनुष्य औद्योगिक और यांत्रिक विकास कर पाए या नहीं, इनसे मानवता की कोई क्षति नहीं होने वाली है, किंतु उसमें मानवीय गुणों का विकास नहीं होता है तो कुछ भी नहीं होता है। एक मानवता बचेगी तो सब... आगे पढ़े

 व्यक्तिगत चेतना का विस्तार 

Updated on 10 August, 2019, 6:00
दूसरों के सुख-दुख का भागी बनने से हमारी व्यक्तिगत चेतना विकसित होकर विश्व चेतना बन जाती है। समय के साथ जब ज्ञान की वृद्धि होती है, तब उदासीनता संभव नहीं। तुम्हारा आंतरिक स्रोत ही आनन्द है।अपने दु:ख को दूर करने का उपाय है विश्व के दुख में भागीदार होना और... आगे पढ़े

 'थुकदम’ पर शोध खोलेगा जीवन-मृत्यु का रहस्य 

Updated on 8 August, 2019, 6:00
गीता में कहा गया है कि शरीर तो एक पुतला मात्र है इसमें मौजूद आत्मा जीव है। यह जिस शरीर में होता है उस शरीर के गुण, कर्म और अपेक्षा के अनुरूप मृत्यु के बाद नया शरीर धारण कर लेता है। आत्मा न तो जन्म लेता है और न इसकी... आगे पढ़े

मन की शक्ति 

Updated on 7 August, 2019, 6:00
मन को जीवन का केंद्रबिंदु कहना असंभव नहीं है। मनुष्य की क्रियाओं, आचरणों का प्रारंभ मन से ही होता है। मन तरह-तरह के संकल्प, कल्पनाएं करता है। जिस ओर उसका रुझान हो जाता है उसी ओर मनुष्य की सारी गतिविधियां चल पड़ती है। जैसी कल्पना हो उसी के अनुरूप प्रयास-पुरुषार्थ... आगे पढ़े

 इस तरह रामचरित मानस बना धर्म शास्त्र 

Updated on 5 August, 2019, 6:00
करीब पांच सौ साल पहले तक कोई धर्म ग्रंथ हिंदी में नहीं था। सभी धर्म ग्रंथ संस्कृत में थे और चूंकि मध्य काल में शिक्षा दीक्षा का चलन काफी कम हो गया था, भक्ति भावना या धर्म श्रद्धा के लिए लोग संस्कृत विद्वानों की ओर ही ताकते थे। ऐसा कोई... आगे पढ़े

दूसरों के दुख से अपना दुख ज्यादा बेहतर

Updated on 4 August, 2019, 6:00
एक कहावत है 'राजा दुखी, प्रजा दुखी सुखिया का दुख दुना।' कहने का अर्थ यह है कि संसार में जिसे देखो वह अपने को दुखी ही कहेगा। राजा का अपना दुख है, प्रजा का अपना और जिसे आप सुखी माने बैठें हैं उससे पूछ कर देंखेंगे तो वह भी अपने... आगे पढ़े

व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया 

Updated on 3 August, 2019, 6:00
बदलाव का प्रम निरंतर चलता है।जैन दर्शन इस प्रम को पर्याय-परिवर्तन के रूप में स्वीकार करता है। पर्याय का अर्थ है अवस्था।प्रत्येक वस्तु की अवस्था प्रतिक्षण बदलती है।यह जगत की स्वाभाविक प्रक्रिया है। कुछ अवस्थाओं को प्रयत्नपूर्वक भी बदला जाता है।स्वभाव से हो या प्रयोग से, बदलाव की प्रक्रिया को... आगे पढ़े

दोनों प्रकार का धन एक साथ नहीं मिल सकता  

Updated on 1 August, 2019, 6:00
संसार में दो प्रकार का धन होता है भौतिक धन और दूसरा आध्यात्मिक धन। मनुष्य का स्वभाव है कि वह ज्यादा से ज्यादा धन कमाने की चाहत रखता है। कोई व्यक्ति सोना, चांदी, रूपये पैसे का अंबार लगाकर धनवान कहलाता है तो कोई भूखा, प्यासा रहकर भी धनवान कहलता है।... आगे पढ़े

 साधना और सुविधा

Updated on 31 July, 2019, 6:00
आसक्ति के पथ पर आगे बढ़ने वाले अपनी आकांक्षाओं को विस्तार देते हैं। उनकी इच्छाओं का इतना विस्तार हो जाता है, जहां से लौटना संभव नहीं है। उस विस्तार में व्यक्ति का अस्तित्व विलीन हो जाता है। फिर वह अपने लिए नहीं जीता। उसके जीवन का आधार पदार्थ बन जाता... आगे पढ़े

कर्म के पाप-पुण्य में फंस जाता है जीव

Updated on 30 July, 2019, 6:00
ईश्वर क्षेत्रज्ञ या चेतन है, जैसा कि जीव भी है, लेकिन जीव केवल अपने शरीर के प्रति सचेत रहता है, जबकि भगवान समस्त शरीरों के प्रति सचेत रहते हैं। चूंकि वे प्रत्येक जीव के हृदय में वास करने वाले हैं, अतएव वे जीवविशेष की मानसिक गतिशीलता से परिचित रहते हैं।... आगे पढ़े

सुख की उपेक्षा क्यों?

Updated on 29 July, 2019, 6:00
मेरे पास लोग आते हैं। जब वे अपने दुख की कथा रोने लगते हैं, तो बड़े प्रसन्न मालूम होते हैं। उनकी आंखों में चमक मालूम होती है। जैसे कोई बड़ा गीत गा रहे हों! अपने घाव खोलते हैं, लेकिन लगता है जैसे कमल के फूल ले आए हैं। सुख की... आगे पढ़े

 सुख के स्वभाव में डूबो 

Updated on 28 July, 2019, 6:00
लगता है, आदमी दुख का खोजी है। दुख को छोड़ता नहीं, दुख को पकड़ता है। दुख को बचाता है। दुख को संवारता है; तिजोरी में संभालकर रखता है।   दुख का बीज हाथ पड़ जाए, हीरे की तरह संभालता है। लाख दुख पाए, पर फेंकने की तैयारी नहीं दिखाता। जो लोग... आगे पढ़े

 इच्छाओं को समर्पित करते जाओ  

Updated on 27 July, 2019, 6:00
सभी इच्छाएं खुशी के लिए होती हैं। इच्छाओं का लक्ष्य ही यही है। िंकतु इच्छा आपको कितनी बार लक्ष्य तक पहुंचाती है? इच्छा तुम्हें आनंद की ओर ले जाने का आभास देती है, वास्तव में वह ऐसा कर ही नहीं सकती। इसीलिए इसे माया कहते हैं। इच्छा वैâसे पैदा होती... आगे पढ़े

सम्यक दृष्टिकोण की जरूरत  

Updated on 26 July, 2019, 6:00
आज मानवता को बचाने से अधिक कोई करणीय काम प्रतीत नहीं होता। मनुष्य औद्योगिक और यांत्रिक विकास कर पाए या नहीं, इनसे मानवता की कोई क्षति नहीं होने वाली है, िंकतु उसमें मानवीय गुणों का विकास नहीं होता है तो कुछ भी नहीं होता है। एक मानवता बचेगी तो सब... आगे पढ़े

इस तरह रामचरित मानस बना धर्म शास्त्र  

Updated on 25 July, 2019, 6:00
करीब पांच सौ साल पहले तक कोई धर्म ग्रंथ हिदीं में नहीं था। सभी धर्म ग्रंथ संस्कृत में थे और चूंकि मध्य काल में शिक्षा दीक्षा का चलन काफी कम हो गया था, भक्ति भावना या धर्म श्रद्धा के लिए लोग संस्कृत विद्वानों की ओर ही ताकते थे। ऐसा कोई... आगे पढ़े

दूसरों के दुख से अपना दुख ज्यादा बेहतर  

Updated on 24 July, 2019, 6:00
एक कहावत है 'राजा दुखी, प्रजा दुखी सुखिया का दुख दुना।' कहने का अर्थ यह है कि संसार में जिसे देखो वह अपने को दुखी ही कहेगा। राजा का अपना दुख है, प्रजा का अपना और जिसे आप सुखी माने बैठें हैं उससे पूछ कर देंखेंगे तो वह भी अपने... आगे पढ़े

संघर्ष का सौंदर्य

Updated on 23 July, 2019, 6:00
एक बार की बात है कि मिट्टी ने मटके से सवाल जवाब करते हुए कहा, ‘मैं भी मिट्टी तू भी मिट्टी, परंतु पानी मुझे बहा ले जाता है और तुम पानी को अपने में समा लेते हो। वह तुम्हें गला भी नहीं पाता, ऐसा क्यों?’ मिट्टी के सवाल पर मटका... आगे पढ़े

खुद को कर्ता समझ अहंम न पालें 

Updated on 22 July, 2019, 6:00
एक बार हनुमानजी ने प्रभु श्रीराम से कहा कि अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ा, तब मुझे लगा कि इसकी तलवार छीन कर इसका सिर काट लेना चाहिये, किन्तु अगले ही क्षण मैंने देखा कि मंदोदरी ने रावण... आगे पढ़े

शुद्ध मन में आते हैं सद्विचार

Updated on 21 July, 2019, 6:00
मानव जीवन में विचार का विशेष महत्व है। विचार ही इंसान को अच्छा या बुरे कार्य करने के लिए प्रेरित करता है। ऐसे में मन से खराब और दूषित विचारों को रोकने और निकाल फेंकने के लिए यदि थोड़ी कठिनाई हो तो भी सह लेनी चाहिए। वैसे भी यदि सच्चे... आगे पढ़े

परिवर्तनशील संसार का शाश्वत सुख 

Updated on 20 July, 2019, 6:00
मनुष्य जीवन अद्भुत है। इस जीवन के रहते जहां कुछ एक-दूसरे से प्यार करते हैं, वहीं कुछ नफरत करते हुए दिखते हैं। यहां तक कि इंसान, इंसान से भाग रहा है। आज का मानव हर दौड़ में आगे निकल जाने का प्रयास करता रहता है। पर यह दौड़ कब तक?... आगे पढ़े

सहनशीलता में सम्मान 

Updated on 18 July, 2019, 6:00
कहते हैं कि महान से महान व्यक्ति की भी अंतिम समय में भी यदि कोई इच्छा होती है तो वो सिर्फ और सिर्फ और महान बनने की ही होती है। मतलब सम्मान प्राप्त करना किसे अच्छा नहीं लगता है, ऐसे में जरुरी हो जाता है कि सम्मान प्राप्त करने के... आगे पढ़े

नासमझ रोता है भाग्य का रोना

Updated on 17 July, 2019, 6:00
धर्म कोई भी हो, लेकिन आस्थावान को अपने भाग्य पर उतना ही भरोसा होता है जितना कि जीवन और मरण में। वैसे भी मानव समाज में भाग्य को वो स्थान प्राप्त है जो कि किसी अन्य को हो नहीं सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अथक प्रयासों के बावजूद जो... आगे पढ़े

सदमार्ग पर चलें खुशियां मिलेंगी

Updated on 16 July, 2019, 6:00
प्रत्येक धर्म शास्त्र मानव को शिक्षा देते हैं कि किसी और की उन्नति, वैभव या संपन्नता को देखकर ईर्ष्या मत करो। यह नसीहत इसलिए दी जाती है क्योंकि आपकी ईर्ष्या से दूसरों पर तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा, मगर आपका स्वभाव जरूर ईर्ष्यालु होकर बिगड़ जाएगा। किसी दूसरे की समृद्धि... आगे पढ़े

भगवान का स्मरण 

Updated on 15 July, 2019, 6:00
जहाँ भगवान का स्मरण चिन्तन होता है वह स्थान पवित्र माना जाता है। वहाँ के कण-कण में उस परमात्म-तत्त्व के परमाणु फैले रहते हैं। जो आदमी क्रोधी होता है उसके आसपास सात फीट के दायरे में क्रोध के परमाणु फैले रहते हैं। हर इन्सान एक पावर हाउस है। उसमें से... आगे पढ़े

मूवी रिव्यू

राशिफल