Monday, 19 August 2019, 4:02 PM

कविता

चुनरी हरी उढानी है

Updated on 19 August, 2018, 7:00
विवेक रंजन श्रीवास्तव रोप पोस कर पौधे, अनगिन हरे भरे  अपनी जमीं को चूनर, हरी ओढ़ानी है होंगे संकल्प सारे हमारे फलीभूत हम प्रयास तो करें, सफलता आनी है  जब खरीदा, इक सिलेंडर आक्सीजन  तब  वृक्षों की कीमत उसने जानी है  जहाँ अंकुरण बीजों का है  संभव  ब्रम्हाण्ड में सारे , धरा यही वरदानी है  घाटियां गहराईयां , ऊँचाईयां... आगे पढ़े

वक्त बहुत गुजारा मैनें...

Updated on 20 April, 2017, 23:45
वक्त बहुत गुजारा मैनें, खो दिया वो समय कुछ ही क्षण मे| वक्त का कैहर देखो  मुझपर क्षण क्षण भारी सा है शहर में | खुली किताब न ज़िंदगी की पृष्ठ रंग देखा हर क्षण, वक्त भी सलाह करता नही किसी से बदल गया एक क्षण में | मुठ्ठी मे बंदकर समय रखा था,... आगे पढ़े

ये सितारों से भरा आसमा इतना खमोश क्यों है,

Updated on 27 August, 2016, 20:37
ये सितारों से भरा आसमा इतना खमोश क्यों है, ये चाँद सा चेहरा इतना खमोश क्यों है । तेरी चँचलता दिखती है मुझे तेरी आँखों मे, तेरी नादानियाँ दिखती है मुझे तेरी बातों में। तू हँसती है खिलखिला कर, लेकिन तेरा मन इतना खमोश क्यों है। क्या हुनर है तुझमें खुद का गम छुपाकर औरों... आगे पढ़े

"हाॅर्न धीरे बजाओ मेरा 'देश' सो रहा है"...!!!

Updated on 9 August, 2016, 10:29
एक ट्रक के पीछे लिखी ये पंक्ति झकझोर गई...!! "हाॅर्न धीरे बजाओ मेरा 'देश' सो रहा है"...!!! उस पर एक कविता इस प्रकार है कि..... 'अँग्रेजों' के जुल्म सितम से...   फूट फूटकर 'रोया' है...!! 'धीरे' हाॅर्न बजा रे पगले....     'देश' हमारा सोया है...!! आजादी संग 'चैन' मिला है... 'पूरी' नींद से सोने दे...!! जगह मिले वहाँ 'साइड' ले ले... हो 'दुर्घटना'... आगे पढ़े

शिकायत करूँ तुझसे या तेरा शुक्रिया करूँ

Updated on 8 July, 2016, 18:51
शिकायत करूँ तुझसे या तेरा शुक्रिया करूँ। कभी आसमां दिखा देता है,और कभी जमी पर गिरा देता है। अकसर ये तेरी इनायत का तुफान मुझे,किनारे से मजधार पर ला देता है। कभी छमछम करती बारिश तन को भिगा जाती है, तो कभी चिलचिलाती धूप से मन को जला देता है। अकसर ये तेरी इनायत का... आगे पढ़े

काशी के चंदन में है मदीने की वो खुशबू।

Updated on 6 October, 2015, 14:13
काशी के चंदन में है मदीने की वो खुशबू। दुनिया की हर रौनक को मैं नाम तुम्हारे कर दूं। वो मुट्ठी भर उम्मीदें वो गहरे गम के साए। वो छितरी धूप सुनहरी और लंबी-लंबी राहें। लब पर नाम हो रब का जब सफर खत्म हो जाए। तेरी मिट्टी पाक मदीने तेरा कण-कण पावन काशी। जन्नत को मैं क्या चाहूं बस नाम तुम्हारा कह... आगे पढ़े

कैसे इंसान हैं हम

Updated on 20 July, 2014, 22:26
मैं गजल हूं मैं कोई आज का अखबार नहीं। इस सियासत से मेरा कोई सरोकार नहीं।। सब यहाँ आगे निकल जाने पे आमादा हैं। साथ चलने के लिए कोई भी तैयार नहीं।। टुकड़ों-टुकड़ों में बटी है ये हमारी धरती। आसमानों पे मगर एक भी दीवार नहीं।। कैसे इंसान हैं हम साथ रहा करते हैं। प्यार करते हैं... आगे पढ़े

प्यार वही है

Updated on 14 July, 2014, 16:16
तुम मिलोगी कभी, यह उम्मीद नहीं है इस पड़ाव पर भी मेरी बेचैनी वही है। जहां बैठकर सपनों में खो जाते थे हम-तुम पार्क की वह बैंच आज भी वहीं है। तुम्हें भुलाने के लाख जतन किए मैंने फिर भी मई की वह दोपहर आज भी वहीं है। मैं जाता हूं वहां, बैंच को छूता हूं दूर... आगे पढ़े

वह कहीं गायब है...

Updated on 4 June, 2014, 17:33
वह कहीं गायब है... वह कोने में खड़ा महत्वपूर्ण था। उसकी जम्हाई में मेरी बात अपना अर्थ खो देती थी। वह जब अंधेरे कोने में गायब हो जाता तो मैं अपना लिखा फाड़ देता। वह कहीं गायब है.... ’वह फिर दिखेगा’... कब? मैं घर के कोनों में जाकर फुसफुसाता हूँ। ’सुनों... अपने घर में कुछ फूल आए... आगे पढ़े

जिंदगी...

Updated on 10 May, 2014, 19:17
रोज सैकड़ों चेहरे देखने को मिले, न जाने कितने फिर कभी नहीं मिले। हमने भुला दिए सारे शिकवे-गिले, क्या पता कोई आखिरी बार मिले। हम तो अपना दर्द दिल में समेटे चले, रोएंगे तब जब हिसाब का कांधा मिले। जिंदगी गुजर गई खुदा से नहीं मिले, मौत के बाद क्या पता मिले न मिले।                         -मिलिंद बायवार   ... आगे पढ़े

मेरी माँ के जैसी ही ये धरा है।

Updated on 7 May, 2014, 11:37
मेरी माँ के जैसी ही ये धरा है। इसका दिल भी करुणा से भरा है।। हे धरा, तुझमें माँ की तस्वीर नजर आती है, हे धरा, तुझमें हर जीव की तकदीर नजर आती है, हे धरा, तुम हम सबका पालन-पोषण करती हो, हे धरा, तुम में हर रिश्तों की जंजीर नजर आती है, हे धरा, तेरा... आगे पढ़े

अन्नदाता किसान

Updated on 17 April, 2014, 18:50
अन्नदाता किसान   हे अन्नाजी अन्नदाता किसान, अन्न बहुत उपजाता है। कृषि प्रधान है देश हमारा, कृषक यही लूटा जाता है।। तन-मन-धन सब कुछ अर्पण कर, जोखिम लेकर अन्न कमाता। खाद-बीज बिजली पानी का, महंगा बिल जब भर जाता।। लाभ-हानि लेखा-जोखा में, उसके हक में क्या आता। देनदार शावक का बनकर, कर्जदार जब बन जाता।। कर्ज के बदले किसान की, भू-बंधक खाता चढ़ जाता। अन्न दायिनी... आगे पढ़े

सहज मिले अविनासी / कबीर

Updated on 2 April, 2014, 20:12
पानी बिच मीन पियासी। मोहि सुनि सुनि आवत हाँसी ।। आतम ग्यान बिना सब सूना, क्या मथुरा क्या कासी । घर में वसत धरीं नहिं सूझै, बाहर खोजन जासी ।। मृग की नाभि माँहि कस्तूरी, बन-बन फिरत उदासी । कहत कबीर, सुनौ भाई साधो, सहज मिले अविनासी ।। ... आगे पढ़े

साधो, देखो जग बौराना / कबीर

Updated on 2 April, 2014, 20:12
साधो, देखो जग बौराना । साँची कही तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना । हिन्दू कहत,राम हमारा, मुसलमान रहमाना । आपस में दौऊ लड़ै मरत हैं, मरम कोई नहिं जाना । बहुत मिले मोहि नेमी, धर्मी, प्रात करे असनाना । आतम-छाँड़ि पषानै पूजै, तिनका थोथा ज्ञाना । आसन मारि डिंभ धरि बैठे, मन में बहुत गुमाना... आगे पढ़े

मूवी रिव्यू

राशिफल